पूजा गाइड
नवरात्रि पूजा विधि: संकल्प, घटस्थापना और संधि पूजा
घर पर नवरात्रि पूजा करने की आसान गाइड, पहले दिन के संकल्प से लेकर कन्या पूजन और हवन तक।

संकल्प: शुरुआत का व्रत
संकल्प एक छोटा और साफ़ इरादा है, जो नौ दिनों की पूजा या व्रत शुरू करने से पहले लिया जाता है। यह आम तौर पर पहले दिन सुबह स्नान के बाद, घटस्थापना से पहले या ठीक बाद लिया जाता है।
- पूर्व या उत्तर की ओर मुँह करके बैठें। दाहिनी हथेली में थोड़ा जल, कुछ अक्षत और एक फूल लें।
- अपना नाम, अगर पता हो तो गोत्र, और वह जगह बोलें जहाँ पूजा कर रहे हैं।
- समय बोलें: 2026 के लिए यह है विक्रम संवत 2083, आश्विन मास, शुक्ल पक्ष, प्रतिपदा तिथि, रविवार।
- बोलें कि आप क्या करने जा रहे हैं, जैसे "मैं नवरात्रि के नौ दिन माँ दुर्गा की पूजा करूँगा/करूँगी और अपनी सामर्थ्य के अनुसार व्रत रखूँगा/रखूँगी", और उसके पीछे की कामना।
- जल को धरती पर या देवी के सामने रखी थाली में छोड़ दें।
आपके पंडित जी संस्कृत का लंबा संकल्प पढ़ा सकते हैं। अपनी भाषा में सरल शब्दों में संकल्प लेना भी मान्य है।

घटस्थापना 2026
घटस्थापना (कलश स्थापना) से नवरात्रि शुरू होती है। यह प्रतिपदा को, अच्छा हो कि सूर्योदय के बाद दिन के पहले तिहाई भाग में, की जाती है। अगर यह समय निकल जाए तो दोपहर के आसपास का अभिजीत मुहूर्त आम विकल्प है।
मुहूर्त सूर्योदय से गिना जाता है, क्योंकि हिंदू दिन सूर्योदय से शुरू होता है। राहु काल इसलिए दिया गया है क्योंकि कई परिवार इसमें पूजा शुरू नहीं करना पसंद करते; 11 अक्टूबर को यह शाम के करीब पड़ता है, मुहूर्त के काफ़ी बाद। सूर्योदय और राहु काल का अर्थ।
समय नई दिल्ली के लिए भारतीय मानक समय (IST) में निकाला गया है। तिथि शुरू और खत्म होने का पल पूरे भारत में एक ही होता है, लेकिन सूर्योदय, सूर्यास्त, चंद्रोदय, राहु काल और मुहूर्त शहर के हिसाब से बदलते हैं। दूसरे पंचांगों से एक-दो मिनट का अंतर हो सकता है।
ज़रूरी सामग्री
- मिट्टी का बर्तन या कलश
- साफ़ मिट्टी या रेत
- जौ के बीज
- गंगाजल
- आम के पत्ते
- लाल चुनरी में लिपटा नारियल
- कलावा
- रोली, अक्षत, सुपारी
- एक सिक्का और फूल
- अखंड ज्योति के लिए दीया

घटस्थापना कैसे करें
जगह तैयार करें
पूजा की जगह साफ़ करें, लाल कपड़ा बिछाकर लकड़ी की चौकी रखें और देवी का चित्र या मूर्ति पूर्व या उत्तर दिशा की ओर रखें।
जौ बोएँ
चौड़े मिट्टी के बर्तन में मिट्टी की परत बिछाकर जौ बोएँ और थोड़ा पानी छिड़कें। नौ दिनों में अंकुर बढ़ते हैं।
कलश भरें
कलश के गले पर कलावा बाँधें, उसमें गंगाजल भरें और अक्षत, सुपारी, सिक्का और फूल डालें। इसे मिट्टी के बीच में रखें।
ऊपर सजाएँ
कलश के मुँह पर आम के पाँच या सात पत्ते लगाएँ और ऊपर लाल चुनरी में लिपटा नारियल रखें।
देवी का आवाहन करें
अखंड ज्योति जलाएँ, रोली और फूल चढ़ाएँ और माँ शैलपुत्री की प्रार्थना करें। हो सके तो दीपक को पूरी नवरात्रि जलता रखें।
खेतरी (जौ)
घटस्थापना पर बोए गए जौ को खेतरी या जवारे कहते हैं। इन्हें रोज़ हल्का पानी दें। दशमी को अंकुर देवी को चढ़ाकर बाँटे जाते हैं, कई लोग इन्हें कान के पीछे लगाते हैं या साल भर पूजा की जगह पर रखते हैं।

नौ दिनों की रोज़ की पूजा
- स्नान करें, दीया जलाएँ और कलश पर ताज़े फूल चढ़ाएँ।
- उस दिन की देवी की पूजा करें। हर देवी के पेज पर उनका मंत्र और भोग दिया है।
- दुर्गा सप्तशती का एक अध्याय, देवी कवच पढ़ें, या केवल उस दिन का मंत्र जपें।
- भोग चढ़ाएँ और शाम को "ॐ जय अम्बे गौरी" आरती करें।
संधि पूजा और अष्टमी
संधि पूजा उन 48 मिनटों में की जाती है जब अष्टमी खत्म होकर नवमी शुरू होती है: अष्टमी के आखिरी 24 मिनट और नवमी के पहले 24 मिनट। यह उस पल की याद है जब माँ दुर्गा ने चामुंडा रूप लेकर चंड और मुंड असुरों का वध किया था। परंपरा से 108 दीये और 108 कमल चढ़ाए जाते हैं। तिथि पूरे देश में एक ही पल बदलती है, इसलिए यह समय पूरे भारत में एक जैसा है।

कन्या पूजन और हवन
अष्टमी या नवमी को परिवार नौ छोटी कन्याओं को, आम तौर पर दो से दस साल की, देवी के रूप में बुलाते हैं। उनके पैर धोकर तिलक लगाया जाता है और हलवा, पूरी, काले चने के साथ छोटा उपहार दिया जाता है। कई लोग एक बालक को लंगूर या भैरव के रूप में भी बुलाते हैं। 2026 में ज़्यादातर उत्तर भारतीय परिवार सोमवार 19 अक्टूबर को कन्या पूजन करेंगे। नवमी के हवन से नौ दिनों की पूजा पूरी होती है।
नई दिल्ली में नवमी हवन के लिए नवमी तिथि के रहते दो समय हैं: सोमवार 19 अक्टूबर को सुबह 10:52 से सूर्यास्त (शाम 5:47) तक, या मंगलवार 20 अक्टूबर को सूर्योदय (सुबह 6:24) से दोपहर 12:50 तक। दूसरे शहरों में सूर्योदय और सूर्यास्त थोड़ा बदल जाता है।


नवरात्रि की आरती
आरती: ॐ जय अम्बे गौरी
यह माँ दुर्गा (अम्बे माँ) की आरती है, जो नवरात्रि की हर शाम गाई जाती है, चाहे उस दिन कोई भी स्वरूप पूजा जाए। जैसा आखिरी पद में लिखा है, इसकी रचना शिवानंद स्वामी की मानी जाती है।
जय अम्बे गौरी, मैया जय श्यामा गौरी। तुमको निशदिन ध्यावत, हरि ब्रह्मा शिवरी॥ ॐ जय अम्बे गौरी॥
माँग सिंदूर विराजत, टीको मृगमद को। उज्ज्वल से दोउ नैना, चंद्रवदन नीको॥
कनक समान कलेवर, रक्ताम्बर राजै। रक्तपुष्प गल माला, कंठन पर साजै॥
केहरि वाहन राजत, खड्ग खप्पर धारी। सुर-नर-मुनिजन सेवत, तिनके दुखहारी॥
कानन कुण्डल शोभित, नासाग्रे मोती। कोटिक चंद्र दिवाकर, सम राजत ज्योती॥
शुंभ-निशुंभ बिदारे, महिषासुर घाती। धूम्र विलोचन नैना, निशदिन मदमाती॥
चण्ड-मुण्ड संहारे, शोणित बीज हरे। मधु-कैटभ दोउ मारे, सुर भयहीन करे॥
ब्रह्माणी, रुद्राणी, तुम कमला रानी। आगम निगम बखानी, तुम शिव पटरानी॥
चौंसठ योगिनी मंगल गावत, नृत्य करत भैरों। बाजत ताल मृदंगा, अरु बाजत डमरू॥
तुम ही जग की माता, तुम ही हो भरता। भक्तन की दुख हरता, सुख संपति करता॥
भुजा चार अति शोभित, वर मुद्रा धारी। मनवांछित फल पावत, सेवत नर नारी॥
कंचन थाल विराजत, अगर कपूर बाती। श्रीमालकेतु में राजत, कोटि रतन ज्योती॥
श्री अम्बेजी की आरती, जो कोई नर गावै। कहत शिवानंद स्वामी, सुख-सम्पत्ति पावै॥
व्रत खोलना
व्रत आम तौर पर नवमी को कन्या पूजन के बाद या दशमी को, पारिवारिक परंपरा के अनुसार खोला (पारण) जाता है। दशमी को कलश का जल पूरे घर में छिड़का जाता है और देवी को आदर के साथ विदा किया जाता है।